मां काली की भक्ति और मां काली का नाम जप रामकृष्ण परमहंस

मां काली की कृपा कैसे पाएं? | रामकृष्ण परमहंस की गहरी सीख

मां काली का नाम जप की भक्ति केवल मंत्र और विधि तक सीमित नहीं है। इस लेख में रामकृष्ण परमहंस की दृष्टि से नाम-जप, मानस जप, प्रेम और मां के प्रति पूर्ण शरणागति के भाव को समझें।

नमस्कार मित्रों, जय मां काली। क्या आपने कभी ध्यान दिया है कि असंख्य लोग मां काली के सामने पूजा करते हैं? लंबे समय तक मंत्रों का जाप करते हैं? फिर भी उनके भीतर मां की उपस्थिति का अनुभव क्यों नहीं जागता?

और दूसरी ओर दक्षिणेश्वर के एक सरल पुजारी श्री रामकृष्ण परमहंस मां काली से इतनी आत्मीयता से संवाद करते थे। जैसे कोई छोटा बच्चा अपनी जननी से बात करता है। आखिर उनकी भक्ति में ऐसा क्या विशेष था?

वह कौन सा नाम स्मरण करते थे?

क्या उसके पीछे कोई रहस्यमय बीज मंत्र था या फिर बात किसी और गहराई की थी?

आज हम केवल ग्रंथों की बातें नहीं करेंगे, बल्कि उस अनुभूति की गहराई में उतरने का प्रयास करेंगे जिसे रामकृष्ण कथामृत में अनेक प्रसंगों के माध्यम से समझाया गया है।

आज जानेंगे कि मां के निकट कैसे पहुंचे और जप की वास्तविक भावना क्या होनी चाहिए।

यदि आपके हृदय में सचमुच मां को पुकारने की इच्छा है तो यह चर्चा आपकी साधना को देखने का नजरिया बदल सकती है।

आइए भक्ति के इस पवित्र मार्ग पर आगे बढ़ते हैं।

मां काली का प्रिय बनने का रहस्य और रामकृष्ण परमहंस की भक्ति

मित्रों, मुख्य सवाल पर पहुंचने से पहले कि कौन सा मंत्र जपना चाहिए, हमें उस मनस्थिति को समझना होगा जिसमें भक्ति का बीज फलता-फूलता है।

हम अक्सर साधना आरंभ करते ही सबसे पहले बाहरी नियमों के बारे में सोचने लगते हैं। क्या वस्त्र विशेष होने चाहिए? किस दिशा में बैठना उचित है? माला रुद्राक्ष की हो या स्फटिक की?

इस तरह की बातों में हमारा ध्यान इतना फंस जाता है कि साधना का वास्तविक उद्देश्य पीछे छूट जाता है।

श्री रामकृष्ण परमहंस का जीवन हमें इसी विषय में एक अत्यंत महत्वपूर्ण शिक्षा देता है।

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हमारे समाज में एक पुरानी कहावत है, मन निर्मल तो सब तीर्थ पास। इसका संकेत बहुत गहरा है। जब अंतःकरण स्वच्छ हो जाता है तब बाहरी विधियां उतनी महत्वपूर्ण नहीं रह जातीं।

परमहंस देव समझाते थे कि जब तक हृदय में पवित्रता और ईश्वर के लिए तीव्र तड़प पैदा नहीं होती, तब तक बड़े से बड़ा संस्कृत मंत्र भी केवल उच्चारित शब्द बनकर रह सकता है।

जरा उस छोटे बच्चे को देखिए जो अपनी मां के लिए रोता है। क्या वह रोने से पहले व्याकरण की जांच करता है? क्या वह सोचता है कि किस सही उच्चारण में पुकारूं ताकि मेरी मां तुरंत मेरे पास आए?

बिल्कुल नहीं।

उसकी पुकार सीधे उसके हृदय और प्राणों से निकलती है।

रामकृष्ण देव कहते थे कि मां काली संपूर्ण जगत की जननी है। उन्हें जटिल तांत्रिक प्रदर्शन की आवश्यकता नहीं। उन्हें सच्चे भाव की आवश्यकता है।

आज कई लोग साधना को भय से जोड़ देते हैं।

वे कहते हैं कि मंत्र का उच्चारण थोड़ा भी गलत हुआ तो भारी नुकसान हो सकता है। लेकिन परमहंस देव की दृष्टि इससे कहीं अधिक सरल और प्रेमपूर्ण थी।

वे समझाते थे कि यदि कोई बच्चा अपनी मां को किसी नाम से पुकारे और शब्द पूरी तरह सही ना भी निकले तो क्या मां उसकी पुकार को अस्वीकार कर देगी?

मां तो उसके हृदय की बात समझती है।

इसलिए साधना का पहला कदम अपने भीतर से डर को हटाना है।

मां काली डर पैदा करने वाली शक्ति नहीं, बल्कि भय और अज्ञान को मिटाने वाली महामाया है।

भक्ति में सबसे आवश्यक चीज है बेचैनी, तड़प और परमात्मा को पाने की सच्ची चाह।

रामकृष्ण देव इसे समझाने के लिए एक बड़ा प्रभावशाली उदाहरण देते थे।

मान लीजिए किसी व्यक्ति को मालूम हो कि पड़ोस के एक कमरे में बहुत बड़ा खजाना छिपा हुआ है और उसके तथा उस धन के बीच केवल एक कमजोर दीवार है।

क्या वह व्यक्ति चैन से सो पाएगा? क्या उसे आराम मिलेगा?

नहीं।

उसका पूरा ध्यान उसी खजाने पर लगा रहेगा। वह सोचता रहेगा कि दीवार कैसे हटे और वह संपत्ति उसके हाथ कैसे आए? उसकी रात बेचैनी में गुजर जाएगी।

परमहंस देव फिर पूछते थे, क्या तुम्हारे भीतर भगवान को पाने के लिए ऐसी ही तड़प है?

हम कहते तो हैं कि हमें ईश्वर चाहिए, लेकिन हमारी वास्तविक प्राथमिकताएं कुछ और होती हैं।

पहले नौकरी चाहिए, फिर धन चाहिए, फिर समाज में सम्मान चाहिए और इन सबके बाद यदि थोड़ा समय बचा, तो मां काली के सामने दो अगरबत्तियां जला दीं।

मित्रों, यह प्रेमपूर्ण साधना नहीं, बल्कि लेनदेन की भावना है।

मां काली की कृपा कैसे पाएं

रामकृष्ण परमहंस के जीवन पर नजर डालिए।

जब उन्हें दक्षिणेश्वर काली मंदिर की सेवा का अवसर मिला, तब उन्हें पूजा-पाठ की सभी जटिल प्रक्रियाओं का विशेष ज्ञान नहीं था।

आसपास के लोग उन्हें पागल पुजारी तक कह देते थे। कहते थे कि इसे मंत्रों का सही ज्ञान नहीं है।

मगर जब संध्या का समय आता और मंदिर की घंटियां गूंजतीं, तब रामकृष्ण देव का हृदय भावनाओं से भर उठता था।

उनकी आंखों से आंसू बहने लगते और वे धरती पर सिर रखकर पुकारते।

मां, आज का एक दिन भी गुजर गया और तू मुझे दिखाई नहीं दी। तेरे दर्शन के बिना मेरा एक और दिन व्यर्थ चला गया।

यही बेचैनी, यही विरह और समय निकल जाने की पीड़ा वह सच्चा आह्वान है जो मां तक पहुंचता है।

क्या आपकी साधना में कभी ऐसी भावना जागी है?

कमेंट में जरूर बताइएगा कि क्या कभी पूजा के दौरान आपकी आंखों से बिना किसी प्रयास के आंसू निकल आए हैं।

अगर ऐसा हुआ है तो समझिए आपके भीतर भक्ति की दिशा सही बन रही है।

हमारे समाज में कहा जाता है, जैसा देश वैसा भेष। लेकिन अध्यात्म में इसका अर्थ कुछ और हो जाता है।

वहां कहा जा सकता है, जैसी भावना वैसा अनुभव।

यदि आप मां काली को केवल एक क्रोधपूर्ण और भयावह शक्ति मानेंगे, जो आपकी छोटी भूल पर भी सजा देती है, तो आपके भीतर उनका वही रूप बन जाएगा।

लेकिन यदि परमहंस देव की भांति आप उन्हें अपनी ममता भरी मां मानकर पुकारेंगे, जो अपने बच्चे की भूलों को भी प्रेम से स्वीकार करती है, तो साधना का मार्ग अपने आप सहज होने लगेगा।

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मां काली का नाम जप

परमहंस देव ने मन की पवित्रता को लेकर एक बहुत गहरी बात समझाई थी।

कई लोग सोचते हैं कि पहले अपने सारे दोष दूर कर लें। झूठ बोलना छोड़ दें। गलत कर्मों से बच जाएं। फिर भगवान का नाम लेना शुरू करेंगे।

यह बिल्कुल ऐसा है जैसे कोई कहे कि समुद्र में तभी उतरूंगा जब उसकी सारी लहरें रुक जाएंगी।

लेकिन समुद्र की लहरें कब पूरी तरह शांत होंगी और यदि आप उसी का इंतजार करते रहे तो स्नान कभी नहीं कर पाएंगे।

इसीलिए आप जिस स्थिति में हैं, जैसे भी हैं, उसी क्षण मां को पुकारना आरंभ कर दीजिए।

मां का नाम ही वह पवित्र जल है जो धीरे-धीरे भीतर जमी मलिनता को धोता है।

आपको पहले पूर्ण रूप से शुद्ध होकर मां के द्वार तक पहुंचने की आवश्यकता नहीं है।

इसलिए साधना का पहला कदम यही है कि स्वयं को कोई बड़ा साधक या सिद्ध तांत्रिक मानना छोड़ दीजिए।

अपने भीतर एक छोटे और सरल बच्चे की भावना जगाइए।

स्वीकार कीजिए कि मुझे बहुत कुछ नहीं आता। ना मंत्रों का गर्व, ना तंत्र का ज्ञान, ना कठिन विधियों का अहंकार।

मुझे केवल अपनी मां को पुकारना आता है।

यही सरलता मन के अहं को कमजोर करती है।

और ध्यान रखिए, मां काली का वास्तविक अर्थ भी यही है कि जहां अहंकार मिटता है, वहां उनकी उपस्थिति अनुभव होने लगती है।

उनकी मुंडमाला इसी आध्यात्मिक संकेत को दर्शाती है कि मां अपने भक्त के अहम भाव का अंत करके उसे अपने निकट ले आती हैं।

आगे हम उस विशेष भाव को समझेंगे जिसके द्वारा भक्त मां के और करीब पहुंच सकता है।

बिल्ली के छोटे बच्चे से जुड़ा वह कौन सा रहस्य है जिसे रामकृष्ण परमहंस बार-बार समझाते थे और क्या बिना किसी औपचारिक दीक्षा के भी उस दिव्य नाम का स्मरण किया जा सकता है?

इन प्रश्नों को हम विस्तार से समझेंगे।

मित्रों, अब मूल प्रश्न सामने आता है कि मां काली की कृपा का पात्र कैसे बना जाए?

क्या इसके लिए कठिन तप करना आवश्यक है? क्या श्मशान में जाकर विशेष साधना करनी पड़ेगी?

श्री रामकृष्ण परमहंस ने इसका उत्तर एक बेहद सरल और हृदयस्पर्शी उदाहरण के माध्यम से दिया था।

इसे परंपरा में मार्जार न्याय और मर्कट न्याय के नाम से समझाया जाता है। नाम थोड़ा कठिन लग सकता है, लेकिन इसका भाव बहुत सरल है।

परमहंस देव समझाते थे कि भक्तों के दो स्वभाव हो सकते हैं। एक बंदर के बच्चे जैसा और दूसरा बिल्ली के बच्चे जैसा।

जरा इस अंतर को समझिए।

बंदर का बच्चा अपनी मां के शरीर को स्वयं मजबूती से पकड़े रहता है। जब बंदरिया एक डाल से दूसरी डाल पर तेजी से जाती है तब बच्चे को अपनी पूरी शक्ति लगाकर मां को पकड़े रहना पड़ता है।

उसकी पकड़ कमजोर हुई या उसका ध्यान जरा भी भटका तो उसके गिरने की संभावना रहती है।

यहां प्रयास मुख्य रूप से बच्चे की तरफ से होता है।

यह उन साधकों जैसा है जो कहते हैं कि मैं इतना जप करूंगा, इतने व्रत रखूंगा, इतने अनुष्ठान करूंगा और अपनी मेहनत के बल पर भगवान को प्राप्त कर लूंगा।

इसमें साधना तो है, लेकिन कहीं ना कहीं मैं की भावना भी छिपी रहती है।

दूसरी ओर बिल्ली का बच्चा देखिए।

वह अपनी मां को पकड़ने की कोशिश नहीं करता। उसे बस एक ही बात आती है। अपनी मां को आवाज देना।

वह जहां है वहीं पड़ा रहता है और केवल म्याऊं-म्याऊं करके अपनी मां को पुकारता रहता है।

अब यहां पूरा भरोसा किसके ऊपर है?

उस नन्हे जीव की सारी जिम्मेदारी उसकी मां पर होती है। मां स्वयं आती है। बच्चे को अपने मुंह से उठाती है और उसे सुरक्षित स्थान तक पहुंचा देती है।

रामकृष्ण देव समझाते थे कि बिल्ली का बच्चा इस बात की चिंता नहीं करता कि उसकी मां उसे किस जगह लेकर जा रही है।

कभी वह उसे मुलायम बिस्तर पर रख देती है तो कभी किसी साधारण कोने या लकड़ियों के पास छोड़ देती है।

बच्चा हर परिस्थिति में संतुष्ट रहता है।

उसे स्थान की सुविधा नहीं चाहिए। उसे केवल अपनी मां का सानिध्य चाहिए।

मित्रों, मां काली की कृपा पाने की कुंजी भी इसी भाव में छिपी है।

आपको उस बिल्ली के बच्चे जैसी सरल शरण लेनी है।

लेकिन हमारी परेशानी यह है कि हम स्वयं को बंदर के बच्चे की तरह बना लेते हैं।

हम अपनी साधना को अपनी गणना और नियमों से चलाते हैं।

मन में रहता है कि अगर मैंने एक 108 माला पूरी नहीं की तो मेरी प्रार्थना स्वीकार नहीं होगी।

यह पकड़ हमने खुद बनाई है और जैसे ही जीवन में संकट आता है, हमारी पकड़ कमजोर पड़ने लगती है। उसी के साथ विश्वास भी हिलने लगता है।

कहा जाता है कि चिंता इंसान को भीतर से जला देती है।

लेकिन उस बिल्ली के बच्चे के भीतर ऐसी बेचैनी नहीं होती। उसे भरोसा रहता है कि मेरी मां मेरे लिए पर्याप्त है। वही सब संभाल लेगी।

अब अपने भीतर झांक कर देखिए।

क्या आपके अंदर भी ऐसा विश्वास है?

क्या आप अपने जीवन की पूरी बागडोर मां काली को सौंपने के लिए तैयार हैं?

इसी समर्पण को शरणागति कहा गया है।

जब आप मां काली के सामने बैठे तब अपनी पढ़ाई, अपनी समझ, अपनी उपलब्धियां और अपना अहंकार बाहर ही छोड़ आइए।

मां के सामने सरल होकर कहिए, मां मुझे कुछ नहीं आता। मुझे यह भी मालूम नहीं कि तुम्हें प्रसन्न करने का सही तरीका क्या है। अब तुम ही मेरा मार्गदर्शन करो।

जब मनुष्य अपने अहंकार की जिद छोड़कर पूरी तरह मां के भरोसे हो जाता है, तभी भीतर की दिव्य शक्ति अपना कार्य प्रारंभ करती है।

रामकृष्ण परमहंस मुस्कुराते हुए एक बहुत सुंदर दृष्टांत सुनाया करते थे।

वे कहते थे कि जब बच्चा खिलौनों में मग्न रहता है। अर्थात जब हम संसार की इच्छाओं और भोगों में उलझे रहते हैं तब मां अपने काम में लगी रहती है। वह सोचती है कि मेरा बच्चा अभी खेल रहा है। उसे मेरी आवश्यकता नहीं है।

लेकिन जिस क्षण बच्चा सारे खिलौने एक तरफ फेंक देता है और सच्चे मन से रोना शुरू कर देता है, तब मां अपने बाकी काम छोड़कर उसकी ओर दौड़ती है।

साधक को अपने भीतर वही सच्ची पुकार और वही गहरी तड़प जगानी है।

कई लोग सवाल करते हैं कि क्या भगवान को पाने के लिए परिवार और संसार का त्याग करना जरूरी है? क्या सब कुछ छोड़कर संन्यासी बन जाना चाहिए?

परमहंस देव का उत्तर बिल्कुल स्पष्ट था।

वे कहते थे, संसार में रहो लेकिन संसार को अपने भीतर मत बसने दो।

जैसे कीचड़ के बीच खिलने वाला कमल अपने ऊपर कीचड़ नहीं चिपकने देता, वैसे ही जीवन जियो।

वे दाई का उदाहरण भी देते थे।

एक दाई किसी संपन्न परिवार के बच्चे की देखभाल करती है। वह उसे प्यार से अपना बच्चा कहती है। उसे नहलाती है, खाना खिलाती है और उसकी पूरी देखभाल करती है।

फिर भी उसके हृदय में यह स्पष्ट रहता है कि यह बच्चा वास्तव में मेरा नहीं, मेरे मालिक का है।

जिस दिन उसका काम समाप्त होगा, उसे उस बच्चे को छोड़कर जाना ही पड़ेगा।

ठीक इसी भावना के साथ संसार में अपना जीवन बिताइए।

परिवार की जिम्मेदारियां निभाइए। अपने घर को अपना घर समझकर उसकी सेवा कीजिए। लेकिन भीतर कहीं यह स्मरण बना रहे कि मां, यह सब वास्तव में तेरा है।

यह घर भी तेरा है। यह शरीर भी तेरा है और मेरा जीवन भी तेरी ही देन है।

मैं केवल तेरी सेवा करने वाला हूं। तेरा दास हूं।

जब यह दृष्टि भीतर स्थिर हो जाती है तब साधक उस बिल्ली के बच्चे जैसा हो जाता है।

फिर आपको हर समय इस चिंता में पड़ने की आवश्यकता नहीं रहती कि कौन सा मंत्र सबसे शक्तिशाली है या किस दिशा में बैठकर जप करना चाहिए।

मां स्वयं धीरे-धीरे आपके जीवन को उचित दिशा की ओर ले जाने लगती है।

लेकिन यहां मनुष्य के सामने एक बड़ी चुनौती आती है।

मन को केवल समझा देना इतना सरल नहीं है। हमारा चंचल मन बार-बार दूसरी चीजों की ओर भागता रहता है।

उसे किसी ऐसे आधार की आवश्यकता होती है जिसे वह लगातार पकड़ सके और वही आधार है मां का नाम।

लेकिन अब प्रश्न उठता है, मां का कौन सा नाम लिया जाए?

क्या केवल प्रेम से काली पुकारना पर्याप्त है या कोई विशेष बीज मंत्र आवश्यक है जिसे गुरु शिष्य के कान में प्रदान करते हैं?

और यदि अभी तक गुरु की प्राप्ति नहीं हुई है तो साधक किस नाम का स्मरण करें?

अगले भाग में मैं आपको वह सरल और प्रभावशाली मार्ग बताऊंगा जिसकी ओर परमहंस देव स्वयं संकेत करते थे।

जप करने की वह पद्धति जिससे धीरे-धीरे मन की चंचलता कम होने लगती है और भीतर शांति का अनुभव जागता है।

मित्रों, उस दिव्य नाम की चर्चा करने से पहले एक छोटी सी बात आपके साथ साझा करना चाहता हूं।

यह कोई सामान्य जानकारी नहीं है। यह उन अनुभूतियों का सार है जिन्हें संतों ने अपने जीवन की साधना से प्राप्त किया।

धार्मिक द्वार का प्रयास भी यही है कि सनातन परंपरा के उन गहन संदेशों को आपके सामने लाया जाए जो समय के साथ हमारी व्यस्तता और भीड़ में कहीं पीछे छूट गए हैं।

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और हां, कमेंट बॉक्स में मां के प्रति प्रेम से एक बार जरूर लिखिए, जय मां भवतारिणी।

आइए अब जप के वास्तविक रहस्य को समझते हैं।

मित्रों, जब हमने बिल्ली के बच्चे वाली शरणागति का भाव समझ लिया, तब अगला सवाल यही है कि आखिर जप किया कैसे जाए?

बहुत से साधक मुझसे कहते हैं, महाराज, जब हम नाम स्मरण करते हैं तो मन टिकता ही नहीं।

जुबान से तो काली-काली चलता रहता है, लेकिन दिमाग में दफ्तर का काम, परिवार की बातें और दूसरी परेशानियां घूमती रहती हैं।

तो क्या ऐसे जप का भी कोई लाभ होता है?

श्री रामकृष्ण परमहंस इस प्रश्न का उत्तर बेहद सरल ढंग से समझाते थे।

उन्होंने एक भक्त को उदाहरण देते हुए कहा था कि नाम जप कुछ-कुछ नाव चलाने जैसा है।

मान लीजिए आप नाव के अंदर बैठे हैं और पूरी शक्ति लगाकर चप्पू चला रहे हैं। शरीर थक रहा है, पसीना निकल रहा है और आप लगातार प्रयास कर रहे हैं।

लेकिन इसके बावजूद नाव अपनी जगह से आगे नहीं बढ़ रही।

आखिर ऐसा क्यों हो रहा है?

कारण यह है कि आपने नाव को किनारे से बांधने वाली रस्सी खोली ही नहीं।

आपकी सारी मेहनत के बावजूद नाव वहीं अटकी रहेगी।

यही रस्सी हमारे भीतर मौजूद मोह और आसक्ति है।

यदि मन में संसार की चिंताओं, इच्छाओं और उलझनों का बोझ भरा हुआ है और उसी मन से जप किया जा रहा है तो वह केवल बाहरी मेहनत रह जाएगी। साधना का वास्तविक असर नहीं आएगा।

तो फिर क्या करना चाहिए? क्या मन नहीं लगता? इसलिए नाम जप ही बंद कर दें?

बिल्कुल नहीं।

परमहंस देव कहते थे कि निरंतर अभ्यास करते रहो।

हमारे संतों ने भी अभ्यास की शक्ति को बहुत सुंदर तरीके से समझाया है।

बार-बार प्रयत्न करने से जड़ बुद्धि भी समझदार बन जाती है। जैसे लगातार आने-जाने वाली रस्सी पत्थर पर भी निशान बना देती है।

ठीक उसी प्रकार मां के नाम का नियमित स्मरण आपके पुराने और कठोर संस्कारों को धीरे-धीरे कमजोर कर देगा।

रामकृष्ण देव ने मन को साधने के लिए एक बेहद सरल उपाय भी बताया था।

वे कहते थे कि सुबह या संध्या जब जप करने बैठो तो पहले एक बार ताली बजाओ।

हां, बिल्कुल ताली।

उनका कहना था कि जिस प्रकार पेड़ के नीचे जोर से ताली बजाने पर बैठे हुए पक्षी उड़ जाते हैं, उसी तरह ताली बजाकर अपने भीतर कहो, मेरे नकारात्मक विचार दूर हो।

मेरे पुराने पापों का प्रभाव दूर हो और मेरा मन मां के चरणों में टिक जाए।

इसे आप मन को तैयार करने की एक प्रक्रिया भी समझ सकते हैं।

इससे भीतर एक संकेत जाता है कि अब कुछ समय के लिए संसार की भागदौड़ पीछे रखनी है और अपना ध्यान मां की ओर मोड़ना है।

अब सवाल है कि जप के दौरान मन को एक जगह कैसे रोका जाए?

इसके लिए परमहंस देव एकाग्रता का उदाहरण एक बगुले से देते थे।

क्या आपने कभी नदी या तालाब के किनारे बगुले को मछली की प्रतीक्षा करते देखा है?

वह कई बार एक पैर पर बिल्कुल शांत खड़ा रहता है।

छोटी-छोटी मछलियां उसके आसपास से निकलती रहती हैं, लेकिन वह अपना ध्यान नहीं हटाता।

वह बिना जल्दबाजी के प्रतीक्षा करता रहता है और जैसे ही सही अवसर आता है, वह तुरंत झपट कर बड़ी मछली पकड़ लेता है।

जप करते समय आपको भी इसी तरह रहना है।

मन में तरह-तरह के विचार आएंगे। उन्हें छोटी मछलियों की तरह आने-जाने दीजिए।

हर विचार से लड़ने की जरूरत नहीं है।

बस अपने ध्यान को बार-बार उस बड़ी मछली की ओर लौटाइए। अर्थात मां काली के स्मरण और उनके दर्शन की भावना पर।

ठाकुर श्री रामकृष्ण ने एक और महत्वपूर्ण बात कही थी, एकांत में रोना।

यदि आप पूरे दिन लोगों के बीच बैठकर माला फेरते रहेंगे तो लोग आपको भक्त और धार्मिक व्यक्ति कह सकते हैं। आपकी प्रशंसा भी हो सकती है।

लेकिन केवल दिखावे से मां की प्राप्ति नहीं होती।

उसके लिए भीतर की पुकार चाहिए और उस पुकार को सुनने के लिए कुछ समय एकांत में बिताना जरूरी है।

दिन के पूरे 24 घंटों में से केवल 15 मिनट अपने लिए अलग निकालिए।

ऐसी जगह बैठिए जहां कुछ समय के लिए कोई दूसरा व्यक्ति ना हो।

मोबाइल दूर रखिए। परिवार और मित्रों की बातचीत से भी अलग हो जाइए।

अपनी माला लेकर शांत बैठिए और बिना आवाज किए मन के भीतर मां के नाम का स्मरण कीजिए।

इसे मानस जप कहा जाता है।

मानस जप की विशेषता यही है कि इसमें साधक का ध्यान बाहरी ध्वनि से हटकर भीतर की ओर जाता है।

बोलकर किए जाने वाले जप में मन और वाणी दोनों सक्रिय होते हैं। लेकिन जब नाम भीतर ही भीतर चलता है तब साधक अपनी चेतना को अधिक गहराई से उसी नाम में लगा सकता है।

तो साधना का तरीका बिल्कुल स्पष्ट है।

थोड़ा एकांत खोजिए। शुरुआत में ताली बजाकर अपने मन को संसार से हटने का संकेत दीजिए।

फिर बगुले जैसी धैर्यपूर्ण एकाग्रता रखिए।

और सबसे महत्वपूर्ण बात, हर समय यह मत सोचिए कि मैंने कितनी मालाएं पूरी कर लीं।

संख्या के पीछे भागने के बजाय नाम में उतरने का प्रयास कीजिए।

रामकृष्ण देव का भाव था कि यदि मां आपकी अपनी मां हैं तो उनके साथ बातचीत करते समय क्या आप शब्दों की गिनती करेंगे?

माला मन को एक जगह टिकाने का साधन है। लेकिन जप की वास्तविक गहराई तब आती है जब गिनती पीछे छूट जाती है।

हाथों में पकड़ी माला का ध्यान नहीं रहता और हृदय से बहने वाले आंसू स्वयं नाम की एक नई माला बन जाते हैं।

अब हम उस सवाल तक पहुंचते हैं जिसके जवाब के लिए यह पूरा वीडियो तैयार किया गया है।

आखिर वह कौन सा नाम है? वह कौन सा मंत्र है?

साथियों, तंत्र की परंपरा में असंख्य मंत्र बताए गए हैं। क्रीं, ह्रीं, ह जैसे शब्द भी बीज मंत्रों की श्रेणी में आते हैं।

आज इंटरनेट और पुस्तकों में आपको अनगिनत मंत्र आसानी से मिल जाएंगे।

कई लोग दावा करते हैं कि यह मंत्र करो और 21 दिनों में चमत्कार दिखाई देने लगेगा।

लेकिन सावधान, धार्मिक द्वार पर हम आपको किसी भ्रम में डालने का काम नहीं करेंगे।

श्री रामकृष्ण परमहंस, जिन्हें मां काली का महान भक्त माना जाता है, उन्होंने इस विषय में बहुत स्पष्ट सावधानी बताई थी।

बीज मंत्र यानी सीड मंत्र अत्यंत प्रभावशाली माने जाते हैं। इनके भीतर अग्नि के समान तीव्र शक्ति होती है।

गुरु की उचित मार्गदर्शना के बिना केवल पुस्तक देखकर या इंटरनेट वीडियो देखकर कठिन बीज मंत्रों का अभ्यास करना शरीर और मन दोनों के संतुलन पर विपरीत प्रभाव डाल सकता है।

इसे एक उदाहरण से समझिए।

बीज मंत्र मानो तेज विद्युत प्रवाह है और हमारा शरीर उस ऊर्जा को संभालने वाला तार।

अगर तार पर्याप्त मजबूत नहीं है तो वह गर्म होकर जल सकता है।

फिर सामान्य व्यक्ति के लिए रास्ता क्या है? जिसे अभी तक योग्य गुरु नहीं मिला, वह आखिर क्या करें?

परमहंस देव ने इसके लिए सरल, सुरक्षित और प्रभावी मार्ग बताया था।

उन्होंने कहा कि कलयुग में भगवान के नाम का संकीर्तन ही सबसे बड़ा सहारा है।

मां काली के अनेक पवित्र नाम हैं। लेकिन श्री रामकृष्ण जिन शब्दों में सबसे अधिक डूब जाते थे, वह था मां।

हां, केवल मां।

शायद आपको यह बहुत छोटा और सामान्य लगे। है ना?

मगर इसके पीछे छिपे भाव को देखिए।

जब कोई नन्हा बच्चा अंधकार में अकेला होकर घबरा जाता है, तब वह कोई कठिन मंत्र नहीं पढ़ता। वह कोई शास्त्रीय वाक्य भी नहीं दोहराता।

उसके मुंह से बस एक ही पुकार निकलती है।

मां।

उस छोटे से शब्द में उसका पूरा विश्वास, उसकी सुरक्षा की भावना, उसकी बेचैनी और उसका सारा प्रेम समाया रहता है।

रामकृष्ण देव का भाव था कि यदि मनुष्य पूरी श्रद्धा और हृदय की सच्ची तड़प के साथ केवल मां, मां, मां पुकारे तो यह साधारण पुकार भी अत्यंत प्रभावशाली साधना बन सकती है।

क्योंकि इसमें प्रेम है और मां काली को प्रेम से पुकारने वाला हृदय प्रिय है।

लेकिन यदि आप कोई निश्चित मंत्र चाहते हैं जो सरल भी हो और साधना के लिए सहज भी, तो रामकृष्ण परमहंस की भक्ति परंपरा में प्रचलित एक नाम जप किया जाता है।

वह है, ओम श्री कालिकाय नमः।

इसे सरल भाव से मां के चरणों में समर्पण की तरह लिया जा सकता है।

आप इसे सुबह या शाम, स्नान के बाद या अपनी सुविधा के अनुसार शांत मन से दोहरा सकते हैं।

परमहंस देव एक और महत्वपूर्ण बात बताते थे। रुचि।

उनका संकेत था कि परमात्मा के अनेक नाम हैं।

किसी साधक को राम नाम में आनंद मिलता है। किसी को कृष्ण नाम में और किसी का मन काली के नाम से खिल उठता है।

इसलिए किसी दूसरे के नाम को अपने ऊपर जबरन मत दिए। जिस नाम का स्मरण करते ही आपका मन भीतर से शांत होने लगे, वही नाम आपके लिए विशेष बन सकता है।

यदि मां काली की छवि देखते ही आपके हृदय में प्रेम और श्रद्धा जागती है तो उनके नाम का स्मरण कीजिए।

लेकिन यहां परमहंस देव की एक और गहरी सीख समझना जरूरी है।

गुरु भाव।

यदि आपके जीवन में अभी कोई ऐसा शारीरिक गुरु नहीं है जो आपको दीक्षा दे सके तो निराश मत होइए।

सच्चे मन से ईश्वर को पुकारने वाले साधक के लिए स्वयं ईश्वर ही मार्गदर्शक बन सकते हैं।

साधना आरंभ करने से पहले आप भगवान शिव या श्री रामकृष्ण परमहंस को अपने आराध्य गुरु के रूप में स्मरण कर सकते हैं।

उनकी तस्वीर के सामने शांत होकर बैठिए और मन से कहिए, ठाकुर, मैं अज्ञानी हूं। मुझे सही मार्ग दिखाइए। आप ही मेरे गुरु बनकर मेरा मार्गदर्शन कीजिए।

इसके बाद श्रद्धा से ओम श्री कालिकाय नमः या केवल जय मां काली का स्मरण कर सकते हैं।

हमारे देश में एक प्रसिद्ध कहावत है, जाको राखे साइयां, मार सके ना कोई।

इसका भाव यही है कि जब ईश्वर की कृपा और मां का संरक्षण आपके साथ हो तब बाहरी भय से अधिक महत्वपूर्ण आपका विश्वास होता है।

सच्ची श्रद्धा के सामने मन का डर कमजोर पड़ जाता है और साधक का भरोसा ही उसकी सबसे बड़ी शक्ति बन जाता है।

कथामृत में एक बेहद प्रेरक प्रसंग आता है।

एक बार एक गृहस्थ ने रामकृष्ण देव से विनम्रता से पूछा, ठाकुर, मैं संसार में रहने वाला व्यक्ति हूं। मेरे पास अधिक समय नहीं रहता। फिर मैं इतनी विस्तृत पूजा-पाठ कैसे कर पाऊंगा?

ठाकुर हंस पड़े और बोले, तू अपना वकालतनामा दे दे।

वह व्यक्ति कुछ समझ नहीं पाया और उसने पूछा, किसके नाम ठाकुर?

उन्होंने उत्तर दिया, परमात्मा के नाम।

बस इतना कह देना, हे प्रभु, अब मेरे जीवन का अच्छा-बुरा सब कुछ आपके चरणों में है। अब आप जानिए और अपना कार्य जानिए।

यही पूर्ण समर्पण अपने आप में सबसे महान मंत्र है।

तो फिर सवाल उठता है कि आखिर किस नाम का स्मरण किया जाए?

सबसे सरल है, मां।

मगर पूरे विश्वास, प्रेम और सच्ची भावना के साथ।

यदि कोई सरल मंत्र करना चाहते हैं तो ओम श्री कालिकाय नमः या फिर जय मां का जाप कर सकते हैं।

लेकिन क्रीं, ह्रीं जैसे अत्यंत तीक्ष्ण बीज मंत्रों से तब तक दूर रहना उचित है, जब तक कोई योग्य गुरु स्वयं आपको उसकी दीक्षा और विधि ना बताएं।

एक बात हमेशा याद रखिए।

तोता जब तक सुरक्षित बैठा रहता है, राम-राम बोलता रहता है। लेकिन जैसे ही बिल्ली उसके पीछे झपटती है, उसकी सारी रट भूल जाती है और मुंह से केवल घबराहट की आवाज निकलती है।

आपकी श्रद्धा भी ऐसी नहीं होनी चाहिए कि संकट आते ही भगवान का स्मरण छूट जाए।

आपकी भक्ति उस मजबूत लोहे की तरह होनी चाहिए जो चुंबक के संपर्क में आते ही उससे दृढ़ता से जुड़ जाए।

मां काली से आपका संबंध ऐसा बने कि कठिन से कठिन परिस्थिति भी उस संबंध को कमजोर ना कर पाए।

अब अंतिम चरण में हम इस वीडियो को पूरा करेंगे और आपको एक ऐसा छोटा सा अभ्यास बताएंगे जिसे आप आज रात से ही अपनी साधना का हिस्सा बना सकते हैं।

साथियों, विदा लेने से पहले श्री रामकृष्ण परमहंस की एक बेहद उपयोगी सीख आपके सामने रखना चाहता हूं।

साधना के मार्ग में सबसे बड़ी रुकावट क्या है?

अधीरता। यानी लैक ऑफ पेशेंस।

हम चाहते हैं कि आज नाम जपना शुरू किया और अगले ही दिन मां का साक्षात्कार हो जाए।

लेकिन ठाकुर मन की अवस्था समझाने के लिए गीली माचिस का उदाहरण देते थे।

सोचिए, अगर माचिस की तीली नमी से भीगी हुई है तो आप उसे डिब्बे पर बार-बार रगड़ते रहिए। वह तुरंत आग नहीं पकड़ेगी। वह शायद केवल धुआं करेगी।

यह गीली माचिस उस मन के समान है जो कामना, क्रोध, लोभ और मोह से लगातार नम बना हुआ है।

ऐसे मन को पहले सुखाना पड़ता है और मन को सुखाने का उपाय है संयम, त्याग और लगातार अभ्यास।

तो आज से आपका छोटा सा गृह कार्य क्या रहेगा?

आने वाले 21 दिनों के लिए एक नियम बना लीजिए।

कोई कठिन पूजा नहीं, कोई बड़ा अनुष्ठान नहीं। केवल 10 मिनट।

रात में सोने से पहले जब आप अपने बिस्तर पर हों, आंखें बंद कर लीजिए।

मन में स्वयं को एक छोटे बच्चे के रूप में देखिए और कल्पना कीजिए कि मां काली आपके सिर के पास प्रेम से बैठी हैं।

फिर उनसे अपने पूरे दिन की बातें कीजिए।

जो अच्छा हुआ वह बताइए। जहां गलती हुई उसे स्वीकार कीजिए।

मन में जो दुख है, जो शिकायत है, जो डर है, सब मां के सामने रख दीजिए।

किसी मंत्र का दबाव नहीं, केवल मां से बातचीत।

आप स्वयं अनुभव करेंगे कि कुछ दिनों के लगातार अभ्यास के बाद मन में एक अलग प्रकार की शांति और स्थिरता आने लगी है।

यही भीतर मां की उपस्थिति महसूस होने की पहली झलक हो सकती है।

अब धार्मिक द्वार परिवार के लिए आज का सवाल है।

आपकी साधना के रास्ते में सबसे बड़ी परेशानी क्या आती है?

आलस्य, मन का बार-बार भटकना या समय का अभाव?

कमेंट बॉक्स में केवल एक, दो या तीन लिखकर अपनी समस्या बताइए।

हम प्रयास करेंगे कि आने वाले वीडियो में श्री रामकृष्ण के विचारों के माध्यम से उसी समस्या का सरल समाधान आपके सामने रखा जाए।

तो मित्रों, यही था मां काली के प्रिय बनने का रहस्य।

शक्तिशाली बनने का दिखावा करके नहीं, बल्कि एक छोटे बच्चे की तरह मां की शरण में जाकर।

याद रखिए, रामकृष्ण परमहंस वाणी का उद्देश्य केवल आपको आध्यात्मिक बातें सुनाना नहीं है।

हमारा प्रयास आपको उस आंतरिक द्वार तक पहुंचाने का है जहां ईश्वर को खोजने की जरूरत नहीं पड़ती, क्योंकि वहां वह स्वयं प्रेम से आपकी ओर हाथ बढ़ाए खड़े हैं।

अगर आज की इस चर्चा ने आपके मन को थोड़ा भी स्पर्श किया है तो इसे अपने दोस्तों और परिवार के साथ जरूर साझा कीजिए।

हो सकता है आपके द्वारा भेजा गया यही वीडियो किसी परेशान व्यक्ति के जीवन में आशा की एक नई किरण बन जाए।

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बहुत जल्द फिर मुलाकात होगी एक और गहरे आध्यात्मिक रहस्य के साथ।

तब तक अपने अहंकार को मां के चरणों में रखिए और पूरे प्रेम से बोलिए—

जय मां काली।

जय श्री रामकृष्ण।

मां काली का नाम जप

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