दिव्य दृष्टि क्या है? तीसरा नेत्र और आज्ञा चक्र जागृत होने से जुड़े 8 संकेतों के बारे में जानिए। ध्यान, मंत्र जाप और साधना के दौरान महसूस होने वाले अनुभवों को सरल भाषा में समझें।
क्या आपके साथ कभी ऐसा हुआ है कि आप किसी व्यक्ति से पहली बार मिले हों और एक सेकंड में पता चल जाए कि वह व्यक्ति कैसा है?
क्या कभी ऐसा हुआ है कि कोई घटना होने से पहले दिल घबराने लगे और वही घटना बाद में सच हो जाए? या फिर कभी ऐसा लगा है कि कोई आपको बुला रहा है, मार्ग दिखा रहा है। कोई अदृश्य शक्ति आपको दिशा दे रही है।
अगर आपका उत्तर हाँ है तो ध्यान से सुनिए। यह कोई संयोग नहीं है। यह किसी बड़े परिवर्तन का संकेत है। यह संकेत है कि आपकी दिव्य दृष्टि धीरे-धीरे जागृत हो रही है।
आज हम जिस विषय के ऊपर बात करने जा रहे हैं, यह विषय उन लोगों के लिए बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण है जो भक्ति के मार्ग में हैं और साधनाएँ करते हैं। आज मैं आपको इस वीडियो के माध्यम से दिव्य दृष्टि जागृत होने के कुछ संकेत बताऊंगा।
जिसे कुछ लोग थर्ड आई भी बोलते हैं, कुछ लोग आज्ञा चक्र भी बोलते हैं। तो बिल्कुल भी स्किप मत करना और अंत तक देखना, ताकि जानकारी आपको अच्छे तरीके से समझ में आ जाए।
तो चलिए शुरू करते हैं।
मैं जो भी जानकारी दूंगा, वह सभी जानकारी मेरे ज्ञान, अनुभव और साधना मार्ग पर आधारित है।
दिव्य दृष्टि क्या है?
धर्म ग्रंथों में इसे ज्ञान चक्षु, तीसरा नेत्र या आज्ञा चक्र बोला गया है।
यह कोई साधारण दृष्टि नहीं है। यह चेतना का वह द्वार है जहाँ भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों काल एक ही क्षण में दिखाई देते हैं। जहाँ आत्मा और परमात्मा का संवाद प्रारंभ होता है।
दिव्य दृष्टि खुलना मतलब आप मानव शरीर में रहते हुए भी मनुष्य मात्र नहीं रहते। आप एक चेतना बन जाते हैं।
देखिए, दिव्य दृष्टि जागृत करना हर भक्त और साधक की इच्छा होती है। जो लोग भक्ति के मार्ग में हैं, दरबार लगाना चाहते हैं, तो उनके लिए यह चीज बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण होती है कि वह सामने वाले व्यक्ति के बारे में बारीक से बारीक जानकारी पता कर पाएं।
क्योंकि जब तक उनको सामने वाले व्यक्ति की समस्या ही नहीं पता होगी, तब तक वह उसका समाधान भी नहीं कर पाएंगे।
लेकिन यह सिर्फ यहाँ तक सीमित नहीं है कि आप दूसरों के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकें। दिव्य दृष्टि एक ऐसी चीज है, जिससे आप देवी-देवताओं से ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। आप सूक्ष्म जगत की चीजों को देखने में सक्षम हो जाते हैं।
ऐसी चीजें जिन्हें आप खुली आँखों से नहीं देख सकते, आप उसे दिव्य दृष्टि की सहायता से देख सकते हैं।
दिव्य दृष्टि को प्राप्त करने के कई मार्ग होते हैं। जैसे कि आप मंत्र-जाप, साधनाएँ करके भी दिव्य दृष्टि प्राप्त कर सकते हैं। देवी-देवताओं की कृपा से भी आपको दिव्य दृष्टि प्राप्त हो जाती है या फिर आप योग के माध्यम से भी दिव्य दृष्टि को प्राप्त कर सकते हैं।
लेकिन यह जितना सुनने में आसान लग रहा है, यह इतना आसान नहीं है।
दिव्य दृष्टि प्राप्त करना तो बहुत सारे साधक चाहते हैं, लेकिन दिव्य दृष्टि उन्हीं लोगों को प्राप्त होती है जो काफी लंबे समय से मंत्र-जाप, ध्यान या साधनाएँ करते हुए आ रहे हैं।
क्योंकि देखिए, ऐसा नहीं है कि आप एक महीना या छह महीने मंत्र-जाप, ध्यान या साधनाएँ करेंगे तो आपको दिव्य दृष्टि प्राप्त हो जाएगी।
दिव्य दृष्टि प्राप्त करने के लिए आपको काफी ज्यादा अभ्यास करना पड़ता है। निरंतर जाप करना पड़ता है। तब कहीं जाकर आपको दिव्य दृष्टि प्राप्त होती है।
बहुत सारे ऐसे लोग हैं जो काफी सालों से दिव्य दृष्टि प्राप्त करने के लिए मंत्र-जाप और ध्यान करते हुए आ रहे हैं, लेकिन आज तक उनको दिव्य दृष्टि प्राप्त नहीं हुई।
क्योंकि दिव्य दृष्टि प्राप्त करने के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ती है। बहुत सारे नियमों का पालन करना पड़ता है। तब कहीं जाकर दिव्य दृष्टि प्राप्त होती है।
मां काली का नाम जप और रामकृष्ण परमहंस की भक्ति
दिव्य दृष्टि जागृत होने के 8 संकेत — तीसरा नेत्र और आज्ञा चक्र का रहस्य
तो बात करते हैं सबसे पहले संकेत की।
जब आपको दिव्य दृष्टि प्राप्त होती है और जब आप ध्यान करेंगे, मंत्र-जाप करेंगे, तो आपको आपके आज्ञा चक्र पर एक चुभन का एहसास होगा।
आपको महसूस होगा कि जैसे वहाँ पर चींटियाँ चल रही हैं। वहाँ पर आपको खिंचाव महसूस होगा और जो आपको चुभन महसूस होगी, वह कुछ समय तक आपको महसूस होगी। उसके बाद वह अपने आप ही गायब हो जाएगी और दोबारा से फिर आपको वह चुभन महसूस होनी शुरू हो जाएगी।
ऐसा आपके साथ निरंतर होता ही रहता है और आपके साथ ऐसा इसीलिए होता है जब आप मंत्र-जाप और ध्यान करते हैं, अपने आज्ञा चक्र पर ध्यान लगाकर।
तो इससे साफ पता चलता है कि आपकी ऊर्जा मूलाधार चक्र से ऊपर उठकर आपके आज्ञा चक्र की तरफ जा रही है, जिससे आपकी इंट्यूशन तेज होनी शुरू हो जाती है।
आप बिना कारण चीजें जानने लगते हैं। लेकिन लोगों को लगता है कि आप सिर्फ अनुमान लगा रहे हैं। लेकिन सच्चाई तो यह है कि आप ऊर्जा पढ़ रहे होते हैं, यानी कि ऑरा रीडिंग।
कभी ऐसा होता है कि आपके मन में ख्याल आता है कि कोई व्यक्ति मुझसे बात करना चाहता है, उसका कॉल आने वाला है। थोड़ी देर बाद ऐसा ही होता है कि उस व्यक्ति का कॉल आ जाता है।
कभी ऐसा लगता है कि किसी जगह पर नहीं जाना चाहिए और जो लोग उस जगह पर जाते हैं, वह मुश्किलों में पड़ जाते हैं।
यह सिक्स्थ सेंस नहीं, यह तीसरे नेत्र का प्रारंभिक एक्टिवेशन है।
अगर आपके साथ ऐसा होता है, तो आने वाले बाकी संकेत आपको और भी ज्यादा चौंकाने वाले हैं।
तीसरा नेत्र: आध्यात्मिक जागरण का रहस्यमयी अनुभव
दूसरा संकेत
आपको तब मिलता है जब कोई व्यक्ति आपके पास आता है और वह भी कोई ऐसा व्यक्ति जिसके बारे में आप कुछ भी नहीं जानते। जब वह व्यक्ति आपके सामने आएगा तो उस व्यक्ति के लिए आपके मन में अपने आप ही विचार आने शुरू हो जाएंगे।
आपको पता चलना शुरू हो जाएगा कि वह व्यक्ति कैसा है? उसका स्वभाव कैसा है? वह आपके पास क्यों आया है? उसके साथ सकारात्मक शक्तियाँ हैं या नकारात्मक शक्तियाँ हैं? उस व्यक्ति के साथ क्या-क्या घटनाएँ घट चुकी हैं?
उस व्यक्ति के बारे में आपको हर बारीक से बारीक जानकारी अपने आप ही पता चलनी शुरू हो जाती है।
अब शब्द मायने नहीं रखते। व्यक्ति क्या बोल रहा है, उससे अधिक वह क्या सोच रहा है, यह चीज आप महसूस कर लेते हैं।
सामने वाला व्यक्ति अगर झूठ भी बोल दे तो आपकी चेतना आपको बता देती है, क्योंकि ऊर्जा कभी भी झूठ नहीं बोलती।
तीसरा नेत्र जागरण की 7 शक्तिशाली साधनाएँ
तीसरा संकेत होता है सपनों का संदेश बन जाना।
साधारण मनुष्य सपने भूल जाता है। लेकिन एक जागृत साधक सपनों में संदेश पढ़ता है।
आपको सपने में संस्कृत मंत्र सुनाई दे सकते हैं। किसी गुरु के दर्शन हो सकते हैं।
सपनों के माध्यम से आपको दिखेगा कि जैसे आप लोगों के बारे में कुछ बता रहे हैं। और जब आपको यह चीज दिखेगी तो आपको ऐसा दिखेगा कि जैसे आपने आँखें बंद कर रखी हैं और जो भी आप लोगों के बारे में बता रहे हैं, वह आप सिर्फ अपने आज्ञा चक्र में देखकर बता रहे हैं।
यानी कि वह जानकारी जिसे अवचेतन भी बोलते हैं और यह चीज आपको सपने के माध्यम से बार-बार दिखाई देती ही रहती है।
क्योंकि कुछ चीजें ऐसी होती हैं जो दिन में आपके ध्यान में न आएं। किसी भी व्यक्ति के बारे में वही चीजें सपने के माध्यम से आपके सामने आ जाती हैं।
सपने अब कल्पना नहीं, सूक्ष्म लोक से संवाद बन जाते हैं।
महर्षि व्यास ने कहा है, स्वप्न वह दर्पण है जहाँ आत्मा अपनी यात्रा की झलक दिखाती है।
चौथा संकेत आपको मिलता है विचारों के माध्यम से।
कुछ भी अच्छा या बुरा होने वाला होगा, उस चीज का आभास आपको पहले ही हो जाएगा।
हो सकता है आपका मन घबराने लगे। आपको ऐसा महसूस होने लगे कि कोई घटना घटित होने वाली है।
जो आपको महसूस हुआ था, अगर वह घटना वास्तव में घट जाती है और यह चीज आपके साथ बार-बार होती रहती है, तो यह दिव्य दृष्टि का ही संकेत होता है।
तीसरा नेत्र जागरण के वास्तविक संकेत
अब बात करते हैं पाँचवें संकेत के बारे में।
जब आपको दिव्य दृष्टि प्राप्त होने वाली होती है और उस वक्त जब आप ध्यान करते हैं, मंत्र-जाप करते हैं, तो आपको आपके आज्ञा चक्र में अलग-अलग रंग दिखाई देने शुरू हो जाते हैं।
यह चीज आपके साथ शुरुआत में होती है। बाद में वह रंग धीरे-धीरे एक सफेद प्रकाश में बदल जाते हैं और वह सफेद प्रकाश आपको आपके आज्ञा चक्र में बार-बार दिखाई देता ही रहता है।
यह भी दिव्य दृष्टि जागृत होने का ही संकेत होता है।
यानी कि आज्ञा चक्र में दिव्य ऊर्जा का प्रवाह।
ध्यान करते समय भृकुटी में वाइब्रेशन होनी शुरू हो जाती है। आपको गर्मी महसूस होने लगती है। शरीर में गर्मी महसूस होने लगती है।
यह सब भ्रम नहीं है। यह कुंडलिनी ऊर्जा का आरोहण है, यानी कि कुंडलिनी शक्ति का जागृत होना।
जब ऊर्जा आज्ञा चक्र तक पहुँचती है तो साधक दुनिया को आँखों से नहीं देखता, चेतना से देखना शुरू कर देता है।
जैसे कि महाभारत में बताया गया है, जब अर्जुन का तीसरा नेत्र खुला तभी वह विराट रूप देख सका था।
छठा संकेत आपको ध्यान के माध्यम से या मंत्र-जाप करते समय मिलता है।
मानकर चलिए आप भगवान शिव की पूजा करते हैं तो जब आप ध्यान या मंत्र-जाप करेंगे तो आपको भगवान शिव से जुड़ी हुई चीजें ध्यान के माध्यम से दिखनी शुरू हो जाएंगी।
जैसे कि उनका डमरू, त्रिशूल, उनके गले का साँप।
देखिए, ऐसा नहीं है कि आपको भगवान शिव के दर्शन हो जाएंगे। यह सिर्फ एक शुरुआत है और यह एक दिव्य दृष्टि जागृत होने का ही संकेत होता है।
सातवाँ संकेत भी आपको ध्यान या मंत्र-जाप करते समय ही मिलता है।
जब आप अपने इष्ट के मंत्रों का जाप करेंगे तो आपको ऐसा महसूस होगा कि जैसे आपके मन में उठ रहे सवालों के जवाब आपको कोई बता रहा है।
आपसे कोई बात कर रहा है। यानी कि आपके देवी-देवता आपको ध्यान के माध्यम से आपके सवालों के जवाब देना शुरू कर देते हैं।
साथ में आपको ध्यान के माध्यम से भविष्य में होने वाली घटनाओं के बारे में भी दिखना शुरू हो जाता है और जो चीजें आपको ध्यान के माध्यम से दिखती हैं, वह चीजें वास्तव में कुछ समय बाद घटित हो जाती हैं।
आठवाँ संकेत भी आपको मंत्र-जाप और ध्यान करते समय मिलता है।
जब कोई शुरुआत में साधक साधनाएँ करता है, मंत्र-जाप करता है, तो उसको ऐसा महसूस होता है कि उसके आसपास कोई शक्ति है। लेकिन वह उन शक्तियों को पहचान नहीं पाता।
लेकिन जैसे-जैसे दिव्य दृष्टि जागृत होने वाली होती है या दिव्य दृष्टि जागृत हो जाती है, तो वह साधक उन शक्तियों को पहचानने में सक्षम हो जाता है।
वह पहचान लेता है कि उसके आसपास देवी-देवताओं के गण, दूत या देवी-देवताओं की ऊर्जा है या कोई नकारात्मक शक्ति।
ऐसा आपके साथ तब भी होता है जब आप किसी के घर पर जाते हैं।
जब वहाँ पर जाएंगे तो वहाँ पर आपको अपने आप ही महसूस हो जाएगा कि वहाँ पर कोई नकारात्मक शक्ति है या सकारात्मक शक्ति है।
या फिर उस घर के ऊपर किसी ने कोई तंत्र क्रिया तो नहीं करवा रखी।
तो देखिए, दिव्य दृष्टि कोई खिलौना नहीं है। यह शक्ति है और शक्ति का सही प्रयोग ही साधक को सिद्ध बनाता है।
जो इसे अहंकार में उपयोग करता है, उसकी शक्ति नष्ट हो जाती है और जो इसे समर्पण में उपयोग करता है, उसका मार्ग स्वयं महादेव प्रशस्त करते हैं।
साथ में आपको मैं एक महत्वपूर्ण बात भी बताना चाहूँगा।
हो सकता है किसी चीज को प्राप्त करना आसान हो, लेकिन उस चीज को बनाए रखना बहुत ज्यादा मुश्किल होता है।
कई ऐसे लोग हैं जिन्हें दिव्य दृष्टि तो प्राप्त हो जाती है, लेकिन बाद में उनकी दिव्य दृष्टि बंद हो जाती है। उनको सब कुछ दिखना बंद हो जाता है।
क्योंकि दिव्य दृष्टि प्राप्त होने के बाद भी आपको निरंतर अभ्यास करना पड़ता है। उस ऊर्जा को बनाए रखना पड़ता है।
और यहीं पर बहुत सारे लोग गलती कर बैठते हैं।
यानी कि जब उनको दिव्य दृष्टि प्राप्त हो जाती है, भूत, भविष्य, वर्तमान की घटनाएँ उनको पता चलनी शुरू हो जाती हैं, तो उसके बाद वह मंत्र-जाप, ध्यान या साधनाएँ करना छोड़ देते हैं।
उनको लगता है कि अब तो मेरी दिव्य दृष्टि जागृत हो चुकी है। अब मुझे मंत्र-जाप, ध्यान या साधनाएँ करने की जरूरत नहीं है।
जिस कारण से जो उनकी ऊर्जा मूलाधार चक्र से उठकर आज्ञा चक्र की तरफ गई थी, वह वापस दोबारा नीचे की तरफ गिरना शुरू हो जाती है।
जिस कारण से उनकी दिव्य दृष्टि डीएक्टिवेट हो जाती है।
तो ऐसा नहीं है कि अगर आपको दिव्य दृष्टि प्राप्त हो चुकी है तो वह हमेशा आपके साथ रहेगी।
उसको बनाए रखने के लिए आपको निरंतर जाप, ध्यान और अभ्यास करना पड़ेगा।
तो भक्तों, मैं उम्मीद करता हूँ कि जो जानकारी मैंने आपको दी है, यह जानकारी आपको अच्छी तरह समझ में आ गई होगी।