pooja ke time rona kyo aata hain

पूजा में उबासी और आंसू — यह शाप नहीं, देवता का स्पर्श है

“पूजा में उबासी और आंसू — यह शाप नहीं, देवता का स्पर्श है”

नमस्कार मित्रों… आज मैं आपसे एक ऐसी बात करने जा रही हूँ जो वर्षों से आपके मन में उलझी हुई है।

आप पूजा करते हो… मंत्र जपते हो… माँ काली के सामने बैठते हो… और तभी उबासी आ जाती है। आँखें भर आती हैं।

और मन में एक डर बैठ जाता है — “क्या मैंने कुछ गलत किया? क्या कोई नकारात्मक शक्ति है मेरे ऊपर?”

मित्रों… आज इस डर को हमेशा के लिए निकाल फेंकिए।

क्योंकि आज जो मैं आपको बताने जा रही हूँ — वह सुनकर आपका साधना मार्ग और भी दृढ़ हो जाएगा।


“वर्षों की भटकन का कारण क्या है?”

मित्रों… बहुत से ऐसे भक्त हैं जो वर्षों से भटक रहे हैं।

घर में पूजा होती है। मंदिर जाते हैं। मंत्र जपते हैं। व्रत रखते हैं।

लेकिन मन में एक खालीपन रहता है — “कुछ मिला क्यों नहीं?”

कुछ लोग तो पूरा जीवन इसी उलझन में बिता देते हैं।

इसका एक सबसे बड़ा कारण है — अधूरी जानकारी।

जब पूजा में उबासी आई, किसी ने कह दिया — “भूत-प्रेत का साया है।” जब आँखों में आँसू आए, किसी ने कह दिया — “तुम पर कोई काला जादू है।”

और उस डर की वजह से भक्त ने पूजा छोड़ दी।

उदाहरण: सोचिए एक किसान खेत में बीज बोता है। ज़मीन उपजाऊ है, पानी मिल रहा है, फसल उगने ही वाली है। और ठीक उसी वक्त कोई आकर कह दे — “यह हरियाली नहीं, ज़मीन में ज़हर है।” और किसान खेत छोड़ दे।

बिल्कुल यही हाल उस भक्त का होता है जो डर की वजह से पूजा छोड़ देता है — ठीक उस समय जब देवता का स्पर्श होने वाला था।

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“उबासी और आँसू — यह नकारात्मक नहीं, दिव्य संकेत है”

मित्रों… पहली और सबसे महत्वपूर्ण बात सुनिए ध्यान से।

पूजा में आने वाली उबासी और आँखों के आँसू — यह किसी भूत-प्रेत या नकारात्मक शक्ति का प्रभाव बिल्कुल नहीं है।

यह तो देवता के स्पर्श का पहला संकेत है।

इसके दो मुख्य कारण हैं:


🔹 कारण 1 — भाव का जागरण

जब आप देवता के सामने बैठते हैं और मन से उनसे एक सच्चा रिश्ता बना लेते हैं…

माँ का रिश्ता… पिता का रिश्ता… सखा का रिश्ता…

तब वह मूर्ति या तस्वीर आपके मन में सजीव हो उठती है।

आप उनसे अपनी पीड़ा कहते हैं… अपना दुख कहते हैं… और तब भीतर से एक लहर उठती है।

वही लहर आँखों से आँसू बनकर बहती है।

उदाहरण: जैसे कोई बच्चा वर्षों बाद अपनी माँ से मिलता है। वह कुछ बोल नहीं पाता, बस रो पड़ता है। वह आँसू कमज़ोरी नहीं हैं — वह प्रेम की पराकाष्ठा है।

ठीक वैसे ही जब आत्मा अपने ईष्ट से मिलती है — आँखें भर आती हैं।


🔹 कारण 2 — मूलाधार चक्र का जागरण

मित्रों… हमारे शरीर में सात चक्र होते हैं।

इनमें सबसे पहला और आधार है — मूलाधार चक्र।

जब भी कोई सकारात्मक दिव्य ऊर्जा, देवता की तरंगें आपके शरीर के पास आती हैं — तो सबसे पहले यही चक्र जागृत होता है।

उदाहरण: जैसे एक चुंबक के पास दूसरा चुंबक लाओ — दोनों खिंच जाते हैं, घूमने लगते हैं। बिल्कुल वैसे ही जब देवता की सकारात्मक ऊर्जा आपके मूलाधार चक्र को स्पर्श करती है — वह चक्र घूमने लगता है, जागृत होता है।

और उस जागरण की प्रतिक्रिया शरीर उबासी के रूप में व्यक्त करता है।

यही कारण है कि देवी-देवता की चौकियों में, जब किसी भगत पर सवारी आने वाली होती है — उससे पहले उन्हें बड़ी-बड़ी उबासियाँ आती हैं।

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“ध्यान और मंत्र जाप में उबासी क्यों आती है?”

मित्रों… एक और महत्वपूर्ण कारण है।

जब आप मंत्र जाप करते हैं या ध्यान लगाते हैं, तो शुरुआत में मन भटकता है।

कभी घर की याद आती है… कभी काम की चिंता… कभी पुरानी बातें…

लेकिन जब आप निरंतर जपते रहते हैं… और एक क्षण ऐसा आता है जब मन एकाग्र हो जाता है।

आज्ञा चक्र पर — जो दोनों भौंहों के बीच होता है — ध्यान पूरी तरह टिक जाता है।

ठीक उसी क्षण उबासी आती है।

उदाहरण: जैसे रेडियो के पुराने ज़माने में antenna घुमाते थे। बहुत देर तक आवाज़ नहीं आती — बस शोर होता है। और जैसे ही सही frequency पर आते हैं — गाना साफ़ सुनाई देने लगता है। उबासी उसी “right frequency” पकड़ने का संकेत है।

इसलिए उबासी आने पर पूजा मत छोड़िए — वह तो सफलता का पहला द्वार है।

और एक और बात —

जिस स्थान पर आपने वर्षों तक मंत्र जाप किया है, उस स्थान की दीवारें, वह आसन, वह जगह — सब में उस ऊर्जा का वास हो जाता है।

जब आप उस स्थान पर बैठते हैं — उबासी आती है।

क्योंकि वह स्थान आपको पहचानता है। वह ऊर्जा आपका स्वागत करती है।


“सावधानियाँ — जो भूलकर भी मत करो”

मित्रों… अब कुछ ज़रूरी सावधानियाँ सुनिए —

1. उबासी आने पर पूजा मत तोड़िए। यह सबसे बड़ी भूल है। जब उबासी आए — समझिए देवता का द्वार खुल रहा है। उस समय मंत्र जाप और तीव्र करें।

2. किसी की बात में आकर साधना मत छोड़िए। लोग कहेंगे — “भूत है, प्रेत है, काला जादू है।” इन बातों में मत आइए। परखी हुई बात यही है — यह दिव्य संकेत है।

3. पूजा में मन की चंचलता पर क्रोध मत करिए। मन भटकेगा — यह स्वाभाविक है। बिना निराश हुए वापस लाइए। जैसे दीपक की लौ हवा में काँपती है पर बुझती नहीं।

4. जल्दी फल की उम्मीद मत रखिए। साधना एक गहरी नींव है। जितनी गहरी नींव — उतनी ऊँची इमारत।

5. नकारात्मक विचारों के समय पूजा ज़रूर करें। जब मन सबसे अशांत हो — उसी समय पूजा सबसे ज़्यादा ज़रूरी है।

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“सरल विधि — माँ काली या अपने ईष्ट से जुड़ने की”

मित्रों… अब मैं आपको एक छोटी लेकिन बहुत प्रभावशाली विधि बताती हूँ।

इसके लिए न किसी पंडित की ज़रूरत है, न किसी महंगे सामान की।


🕯️ विधि — “भाव से जुड़ाव की साधना”

🔸 समय: प्रातःकाल (ब्रह्म मुहूर्त — सूर्योदय से पहले) या रात्रि में सोने से पहले

🔸 आवश्यक सामग्री:

  • अपने ईष्ट (माँ काली / अपने देवता) की एक तस्वीर या मूर्ति
  • एक दीपक (घी का हो तो उत्तम)
  • अगरबत्ती
  • शुद्ध मन और शांत स्थान

🔸 चरण 1 — स्थान शुद्धि (1 मिनट) जहाँ बैठें, उस स्थान को साफ करें। हाथ-पाँव धोकर बैठें। मन में यह भाव लाएं — “मैं अभी सब कुछ भूलकर सिर्फ माँ के सामने हूँ।”

🔸 चरण 2 — दीपक प्रज्ज्वलन (1 मिनट) दीपक जलाते समय मन में कहें — “माँ, जैसे यह दीपक अंधेरे को मिटाता है, वैसे ही आप मेरे मन का अंधेरा मिटाइए।”

🔸 चरण 3 — नेत्र मिलाप (2 मिनट) तस्वीर को ध्यान से देखिए। माँ की आँखों में देखिए। उन्हें सजीव महसूस करिए। मन में कहिए — “माँ… मैं आपका हूँ। मुझे आप पर पूरा भरोसा है।”

🔸 चरण 4 — मन की बात (2 मिनट) जो भी दुख है, जो भी परेशानी है — बिना शब्दों के या धीरे-धीरे बोलकर माँ को बताइए। कोई नहीं देख रहा। कोई नहीं सुन रहा। बस माँ हैं और आप हैं।

🔸 चरण 5 — मंत्र जाप (5 मिनट) आँखें बंद करें। धीरे-धीरे जपें —

ॐ क्रीं काली ॐ (या अपने ईष्ट का कोई भी सरल मंत्र)

जपते-जपते अगर उबासी आए — रुकिए मत। माँ का स्पर्श है। अगर आँखें भर आएं — रोने दीजिए। वह प्रेम का प्रवाह है।

🔸 चरण 6 — समर्पण (1 मिनट) अंत में हाथ जोड़कर कहें — “माँ… जो भी हो, जैसा भी हो — सब आपकी इच्छा। मैं बस आपका हूँ।”


महत्वपूर्ण: यह विधि कम से कम 21 दिन निरंतर करें। पहले सप्ताह में शायद कुछ न लगे। दूसरे सप्ताह में उबासी, आँसू आने लगेंगे। तीसरे सप्ताह तक एक अलग शांति अनुभव होगी। यही साधना की पहली सीढ़ी है।


मित्रों… आज की बात का सार यही है —

उबासी = मूलाधार चक्र का जागरण = देवता का स्पर्श आँसू = भाव का उफान = आत्मा की पुकार

इन्हें डर की नज़र से मत देखिए। इन्हें उत्सव की तरह मनाइए।

जो लोग वर्षों से भटक रहे हैं — उनसे मैं यही कहूँगी — भटकाव तब तक है जब तक डर है। जिस दिन डर गया — माँ मिल जाती हैं।

माँ काली से विनती करती हूँ — उनकी दया और कृपा आपके ऊपर सदा बनी रहे। आपके घर में सुख हो, समृद्धि हो, शांति हो। बाबा की कृपा दृष्टि आप पर सदा बनी रहे।

हम मिलते हैं अगले पोस्ट में।

तब तक के लिए…

हर हर महादेव… ॐ काली… आदेश गुरूजी को प्रणाम 🙏